ओस की बूँदें

तड़के एक सुप्त अरबी के पत्ते पर कुछ पावन ओस की बूँदें उभर आई। सुबह की सुगबुगाहट में डूबी कुछ क्षणभंगुर ओस की बूदें। अपनी नियति से अनजान एक अनंत जीवन के उल्लहास से ओत प्रोत ये आपस में बतियाने लगी। भाषा-बोध रहित , शब्द-कोष रिक्त एक अजब वार्तालाप हवा में घुलने लगा। खुसर पुसर से शुरू हो कर धीरे धीरे ये बातचीत गरमाने लगी। खिलखिलाहट और उल्ल्हास चारो और गूँजने लगा। पंछी भी शायद इस ऊर्जा की गुद्गुदी से जाग उठे और पंख फैला घोसलों से उड़ चले। ये हलचल पंछियों के चहकने से और सुरीली होने लगी। आकाश की लालिमा अब गहराने लगी थी और की पहली किरणे दबे पाँव धरा पर उतरने लगी।
सूर्य उदय हो रहा था। उसकी गर्माहट में धरा के रंग गहराने लगे। आदत के मारें और प्रेम से विवश सूरजमुखी सर उठा कर सूर्य को निहारने लगे। खिलखिलाती ओस की वो बूँदें इस गर्माहट और तेज से बच न सकी। वो सूर्य की तरफ खिलखिलाते हुए निहारने लगी और फिर अचानक सुध बुध खोये सूफियों के जैसे अपने हाथ ऊपर कर मदमस्त झूमने लगी। ऐसा निश्छल आकर्षण व प्रेम की वो शनेः शनेः सूर्य की गरिमा में विलीन होती चली गयी। जैसे कोई पारियां पत्ते पर कुछ देर अठखेली कर उड़ चली हों।

इस करिश्माई घटनाक्रम से अनजान वो सुप्त अरबी का पत्ता अंगड़ाई ले कर जगा और सुबह की शीतल शुद्ध हवा में झूमने लगा।WP_001078

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