बंद आँखों के परे

वो थक कर आँखें मूँद लेट गयी। घना अन्धकार। पलकों के पट बंद होते ही जैसे रंग और आकार एक भ्रम मात्र रह जाते है। वो आँखों को जोर से भींचती है। हल्का सा दर्द महसूस होता है और उस घने काले अन्धकार में एक विस्मित सा हरा रंग कौंधता है। फिर अजब से चक्रवात उभरने लगते हैं। पीड़ा पर ध्यान नहीं है उसका। वो और जोर से आँखें भींचती है। अब उन चक्रवातों से उभरने लगते है कुछ चमकीले बिन्दु। वो थमती नहीं और आपने दांतों को भी भींच लेती है। वो बिन्दु लाल , हरे , नीले , पीले अननत ब्रह्माण्ड में चमकते अनगिन तारों से प्रतीत होने लगते हैं।

उन अबूझ चक्रवातों के परे वो बंद आँखों से जैसे आकाशगंगा में गोते खाने लगाती है। बंद आँखों में छुपे इस रहस्यमयी तारामंडल में वो लिप्त हो जाती है और धीरे धीरे थक कर चूर हुई आँखें आप ही सहज हो जाती है। फिर अवतरित होने लगते है स्वपन और खुलने लगता है बंद आँखों के परे का विस्मितकारी संसार।
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2 thoughts on “बंद आँखों के परे

  1. the process of dream beautifully analysed.. loved the interplay f words nidhi.. palkon ke pat.. aboojh chakrawat just a few to mention.. lovely 🙂

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