सुबह का सबक

कोहरे में धुंधलाती सड़क पर एक गाड़ी मद्धम गति से चली जा रही थी | सूरज की किरणे अब तेज़ होने लगी थी और कोहरा भी कुछ छट ही गया था | सड़क अभी भी सूनसान थी | इस सर्द सुबह में एक नवेला पिल्ला शायद अपने पहेले कदम नाप रहा था | चालक ने दूर से उससे देखा तो जैसे भ्रमित हुआ | ऐसा लगा दो काले रंग के पक्षी शायद सड़क के बीच बैठे है | पर कुछ ठीक न लगा | पिल्ला मदमस्त सड़क के बीचो बीच अपनी माँ और भाई बन्धुओ से दूर अलग ही विचर रहा था | वो उस चार विचित्र पैरो के जीव को अपने तरफ बढ़ते हुए बड़ी उत्सुकता से देख रहा था | चालक चिड़िया का भ्रम लिए धुधलके में अपनी ही गति से बढे जा रहा था |

इतना नन्हा सा पिल्ला पर कोई भय नहीं | बस पहली सुबह की प्यारी उत्सुकता | तभी चालक का भ्रम टूटा और आँखे फ़ैल सी गयी |अनहोनी के भय से वो सिहर उठा और तुरंत ब्रेक पर पैर पड़ा |

ओह! कितना सुन्दर, कितना नन्हा , कितना मोहक पिल्ला ! चालक ने मुस्कुराते हुए उसे निहारा | पिल्ला अभी भी निर्भीक ,अपनी जगह पर कौतुहल से बंधा ,गाडी को देख रहा था | चालक को उसकी निर्भीक मासूम मुर्खता पर बड़ा प्यार आया और मुस्कुराता हुआ वो पिल्लै के बगल से गाड़ी निकाल चला ! उस क्षण गाड़ी की गति से उठती आवाज़ और हवा ने पिल्लै को झकझोड़ दिया | वो घबरा कर कूँ कूँ करता अपनी माँ की ओर भगा ! उसके कौतुहल में आई इस बाधा ने उसे भय का बोध करा दिया था | उसकी माँ उसे प्रेम से सहलाने लगी |

और इस शीत की धुंधली सुबह ने चुप चाप एक नन्हे जीव को निर्भीकता और मुर्खता में फर्क़ करना सिखा दि