काश के कांच

शरद की जमी हुई सुबह की चुभन की तरह चुभते ये काश के कांच | किसी आइने के टुकड़ों की तरह बिखरें पडे मन के किसी कोने में चुपचाप पडे ये सोच के पैने कांच | काटते , रिसते ,चुभते हर ज़हन में छुप के बैठे हैं ये काश के कांच |

काश ये हुआ होता …. काश वो किया होता … काश वो मिला होता … काश ये न कहा होता … काश थोडा सब्र किया होता … काश थोड़ी महनत और की होती … काश कुछ खतरा उठाया होता …. काश ….काश … काश … काश ….

काश के धीमें से फुसफुसाते हुए छोटे बडे नोकीली कांच | शायद ये कांच नहीं है … बस सोच की जमी हुई बर्फ है जो जम कर पैनी धार ले बैठी है | जैसे मन के कोने में सोच रुक गयी हो और बार बार उसी पछतावे में उलझ कर उम्मीद की धुप खो चुकी हो | सब शिथिल हो जम गया हो जैसे…. और टूट टूट कर मन को घायल करते जा रहे हो उस काश के बर्फीले टुकडे |

शायद सोच को भी सदा चलायमान ही रहना चाहिए | यूँ ठहरने की भूल नहीं करनी चाहिए | ताकी समय रहते काश की कश्ती बनाकर उसे बह जाने दिया जा सके |

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