बसंती हवा की कविता

A tribute to Shri Kedarnath Agarwal’s Poem ” बसंती हवा ”

बसंती हवा की कविता पढ़ी थी
बचपन में उँगलियों के
पोरों पे धरी थी …

बड़ी बावली थी वो
बड़ी मस्तमौला …
मुसाफिर अजब सी
न उद्देश्य, इच्छा
न प्रेमी न दुश्मन …
नगर खेत पोकर
तू उडती चली थी ..

बसंती हवा की कविता पढ़ी थी
बचपन में उँगलियों के
पोरों पे धरी थी …

स्कूल की मेरी किताब
में तू अनोखी छुपी थी
सच  तेरी हरकतें सारी
मुझे मुह ज़बानी रटी थी ..
जिधर चाहती थी तू
उधर घूमती थी ..
निडर तू बहुत थी
सो मेरी प्यारी बड़ी थी …

सभी को तू मदमस्त झुलाती चली थी
मेरे मन में कौतुक जगाती  चली थी ..

बसंती हवा की कविता पढ़ी थी
बचपन में उँगलियों के
पोरों पे धरी थी |

महुया को जो थपथपाया
चढ़ी  आम पर भी और
गेहुयो को भी झुलाया ..

अलसी से तेरी हार पे मुझे
बड़ा लाड आया   …
मना के तुझे में ये
कहना चाहती थी
अरे हिला भी दे  सरसों
डुला भी दे  सरसों …
रूठ न तू  यूँ ऐसे ..
हवा बस हवा तू
बसंती हवा तू …
बड़ी मस्तमौला बस
न हो यूँ  खफा तू ….

हँसी थी बहुत मैं जब
लजाई अरहर को
मुसाफिर पर
तूने था  गिराया ….

बसंती हवा की कविता पढ़ी थी
बचपन में उँगलियों के
पोरों पे धरी थी …

ख़ुशी है मुझे आज तू
है याद  आई …
उँगलियों के पोरों से जैसे
भीनी सी खुशबु है आई..

बड़ी संगीन है हवा आजकल
की …
न है वो मस्ती न ही
सादगी है  …

अब तो दम भर हवा  भी नहीं है
बसंती हवा की बस कहानी रही है |

तेरी बावली याद में कुछ
खुली साँसे है आज  आई
मन में मेरे  भूली
सरसों फिर  है लहराई …

है वादा ये आज  तुझसे
उँगलियों के पोरों में
तुझे छुपा के रखूंगी
ऐ बसंती हवा तुझको
खुद  में बचा के रखूंगी …